कवर्धा। मनरेगा का नाम बदलकर VB–G RAM G योजना किए जाने के बावजूद जमीनी हकीकत में मजदूरों की परेशानी कम होने के बजाय भुगतान को लेकर सवाल लगातार खड़े हो रहे हैं। सरकार की ओर से 15 दिनों में मजदूरी भुगतान की बात कही जाती है, लेकिन दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी मजदूरों को उनकी मेहनत की मजदूरी नहीं मिल पाई है।

अमन वर्मा उपसरपंच ग्राम पंचायत बद्दो, ने कहा कि सरकार नाम और योजनाओं के नाम बदलकर अपनी उपलब्धियां गिनाने में लगी है, लेकिन गांवों में काम करने वाला मजदूर आज भी अपनी मेहनत की कमाई के लिए इंतजार कर रहा है। यह स्थिति सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर साफ दिखाती है।
उन्होंने कहा कि सिर्फ मजदूरी ही नहीं, बल्कि मनरेगा के तहत कराए गए कार्यों की मटेरियल राशि भी लगभग 10–12 महीनों से लंबित बताई जा रही है। इसका सीधा असर ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों और स्थानीय स्तर पर काम करने वाले लोगों पर पड़ रहा है।
अमन वर्मा ने भाजपा सरकार से सवाल किया

जब 15 दिनों में भुगतान का दावा है, तो महीनों से मजदूरों का भुगतान क्यों अटका हुआ है?
जब विकास कार्यों की बात होती है, तो मटेरियल का भुगतान 10–12 महीने तक लंबित क्यों है?
क्या सरकार के लिए मजदूर की मेहनत की कमाई से ज्यादा महत्वपूर्ण सिर्फ योजनाओं का नाम बदलना है?

उन्होंने मांग की कि लंबित मजदूरी और मटेरियल भुगतान की स्थिति सार्वजनिक की जाए तथा पात्र मजदूरों एवं संबंधित हितग्राहियों का भुगतान तत्काल किया जाए।
उन्होंने कहा कि मजदूरों को घोषणा नहीं, उनकी मेहनत की पूरी और समय पर मजदूरी चाहिए। नाम बदलने से जिम्मेदारी नहीं बदलती—सरकार को भुगतान व्यवस्था की जवाबदेही तय करनी होगी।

