नेटवर्क फॉर कंज़र्विंग सेंट्रल इंडिया (एनसीसीआई) द्वारा पाँचवाँ एग्रोबायोडायवर्सिटी राउंडटेबल कान्हा केसली में आयोजित: मिलेट्स इन द सेंट्रल इंडियन लैंडस्केप
जिले के स्वयंसेवी संस्थाओं ने भारत सरकार के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिकों के समझ रखी कबीरधाम की मिलेट्स उत्पादन और संरक्षण का जानकारी
मध्य भारत में मिलेट्स पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाने के उद्देश्य से प्रैक्टिशनर्स, शोधकर्ताओं और समुदाय नेतृत्व को एक मंच पर लाने एवं मध्य भारत के वन–कृषि परिदृश्य में कृषि, जैव विविधता और आजीविका को गहराई से जोड़ते हुए नेटवर्क फॉर कंज़र्विंग सेंट्रल इंडिया (एनसीसीआई) ने 29-30 जनवरी 2026 को अरण्यक रिसॉर्ट, मोचा गाँव, कान्हा टाइगर रिज़र्व में पाँचवाँ एग्रोबायोडायवर्सिटी राउंडटेबल आयोजित किया।

राउंडटेबल में सिविल सोसाइटी संगठनों (सीएसओ), फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइज़ेशन्स (एफपीओ), स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी), शोधकर्ताओं, संरक्षण प्रैक्टिशनर्स और समुदाय नेतृत्वकर्ताओं सहित विभिन्न हितधारकों ने भाग लिया। वर्ष 2023 से शुरू हुए परिदृश्य-स्तरीय संवादों की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए, एनसीसीआई का यह पाँचवाँ राउंडटेबल, नेटवर्क के एग्रोबायोडायवर्सिटी कार्य में महत्वपूर्ण मील का पत्थर रहा। समय के साथ यह मंच साझा – सीख के प्लेटफॉर्म से आगे बढ़कर पहलों को आगे बढ़ाने और मध्य भारत में साझेदारियों को मज़बूत करने का सहयोगी मंच बन गया है। राउंडटेबल का उद्देश्य पिछले संवादों से मिली सीख को समेकित करना और एग्रोबायोडायवर्सिटी को संरक्षण, खाद्य प्रणालियों और ग्रामीण आजीविकाओं के व्यापक प्रयासों से जोड़ने के लिए आगे की रणनीतियाँ तय करना रहा।
राउंडटेबल का उद्घाटन प्रो. रूथ डेफ्रीज़, फाउंडर-डायरेक्टर, एनसीसीआई द्वारा किया गया। उन्होंने प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए वर्ष 2025 की प्रमुख झलकियों पर विचार साझा किया। इसके बाद मानसी मोंगा, प्रोग्राम लीड, एनसीसीआई ने पिछले चार राउंडटेबल्स का पुनरावलोकन प्रस्तुत किया और पाँचवें राउंडटेबल की रूपरेखा साझा किया। जिससे परिदृश्य-आधारित एग्रोबायोडायवर्सिटी कार्य पर गहन चर्चा के लिए आधार तैयार हुआ।

दो दिवसीय राउंडटेबल मध्य भारत के परिदृश्य के लिए एक साझा लेबल विकसित करना और मिलेट्स से जुड़ी खाद्य सुरक्षा पर चर्चा करना रहा। विभिन्न सत्रों के दौरान प्रतिभागियों ने मिलेट-आधारित आजीविकाओं और स्थानीय आहार को सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक व्यावहारिक स्थितियों पर विचार किया, साथ ही उस विज्ञान पर भी चर्चा की जो खाद्य सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों को समझने और किसानों व बाज़ार दोनों का भरोसा बनाए रखने के लिए आवश्यक है। पोषण और खाद्य सुरक्षा विशेष रूप से कोदो मिलेट में मतोना संदूषण के मुद्दे पर प्रो. रूथ डेफ्रीज़, डॉ. मनोज चौधरी (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली भारत सरकार), डॉ. हरि किशन सुदिनी एवं डॉ. मानसा मारुति (इक्रीसेट हैदराबाद) द्वारा मतोना समस्या को बेहतर ढंग से समझने और कोदो मिलेट में उपभोक्ता भरोसा मज़बूत करने हेतु चल रहे वैज्ञानिक प्रयासों की प्रगति साझा की गई। सत्र में विभिन्न मिट्टी प्रकारों और स्थलों पर ट्राइकोडर्मा का उपयोग करते हुए चल रहे बायो-कंट्रोल्ड फील्ड ट्रायल्स की जानकारी दी गई, साथ ही नमी, भंडारण प्रक्रियाओं और बीज की उम्र की भूमिका पर भी चर्चा हुई।

विज्ञान टीम ने साइक्लोपियाज़ोनिक एसिड (सीपीए), जो मतोना का संभावित कारण माना जा रहा है—की पहचान के लिए विकसित किए जा रहे लेटरल फ्लो इम्यूनोअस्से आधारित डायग्नोस्टिक टेस्ट पर भी अपडेट साझा किया। यह परीक्षण संस्थागत स्तर पर अधिक समयबद्ध और किफायती जांच को संभव बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। चर्चा में यह स्पष्ट रूप से उभरा कि जैसे-जैसे मिलेट पुनरुद्धार के प्रयास बढ़ेंगे, किसानों की आजीविका और बाज़ार के भरोसे की रक्षा के लिए ठोस साक्ष्य और विश्वसनीय परीक्षण तंत्र अत्यंत आवश्यक होंगे। मिलेट प्रणालियों को सशक्त बनाने के लिए पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर समग्र ध्यान देना आवश्यक है, जिसमें बीज, खेती की पद्धतियाँ, प्रोसेसिंग और बुनियादी ढाँचा, उत्पाद पहचान और मज़बूत खाद्य सुरक्षा विज्ञान शामिल हैं, और साथ ही समुदायों के अनुभव और नेतृत्व को केंद्र में रखना होगा। राउंडटेबल का समापन आने वाले वर्ष के लिए सामूहिक चिंतन के साथ हुआ, जिसमें परिदृश्य लेबल को एक दीर्घकालिक, किसान-स्वामित्व वाली पहचान के रूप में आगे बढ़ाने और प्रोसेसिंग निरंतरता व खाद्य सुरक्षा पर सहयोगी शोध को मज़बूत करने के इरादे को दोहराया गया।













