
रायपुर। छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास को लेकर राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की गंभीरता पर सवाल उठने लगे हैं। साल 2007 में छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग बना और 2011 में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग कर दिया गया, लेकिन 2018 से 2026 तक आयोग बिना अध्यक्ष के ही चलता रहा। लगभग 8 साल बाद अब जाकर अध्यक्ष की नियुक्ति की गई है।
चंद्रवंशी का आरोप है कि छत्तीसगढ़ी को ‘दोयम दर्जा’ दिया जा रहा है, जिससे न तो इसका कल्याण हो रहा है और न ही यह संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ पा रही है। बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी अन्य महत्वपूर्ण आयोग को इतने वर्षों तक खाली रखा जाता? इस प्रशासनिक देरी ने छत्तीसगढ़ी के भाषाई विकास और मानकीकरण की प्रक्रिया को दशकों पीछे धकेल दिया है। अब देखना होगा कि नई नियुक्ति के बाद क्या महतारी भाखा को वाकई अपना हक मिल पाएगा।
